Wednesday, 9 August 2017

आज किताबें पढ़ कर ख़ाते है

नादान शब्दों में आसमान
छूँ लेते थे
चाँद किताबें क्या पढ़ीं
मंज़िलें आसमान की उँचाइयाँ नापने लगी
यूँ ही कुछ भी खा लेते थे तब
पच जाता था सब
आज किताबें पढ़ कर ख़ाते
 है
फिर भी बीमारियों से झूझ जाते हैं,

मुस्कुराहट सच्ची थी
आँसू भी सच्ची थे,
नादान शब्दों में कहें तो
जैसे थे वैसे ही दिखते थे,
आज चाँद किताबें क्या पढ़ ली
खुशी के पीछे गम छुपाए फिरते हैं
और गम का इज़हार करना चाहें तो
सच्चा यार ढूँढते फिरते हैं

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