Saturday, 21 October 2017

मैं बन कबीरा

मैं बन कबीरा
उठना चाहता हूँ जग क बीड़ा
कहाँ से शुरू करूँ
कोई बतलादे बन गुरु ,
मैं साथ समुंदर के रहूं
सराहना चाहता हूँ हर खुश्बू
वक़्त को सलाम करता
फिर कदम रखूं
दिल में अनगिनत आरज़ू लिए
संग सबके चलूं ,
चाहता हूँ कुछ ऐसा बनाना ये जहाँ
की मुस्काराकर मेरा खुदा कहे
तू मुझमें नही
मैं तुझमें बासू.................

Monday, 16 October 2017

दीपावली की बधाई हो

 दीपावली की बधाई हो

प्रेम संग दिलों की सगाई हो
दुवेश भावना की घर से विदाई हो
अपने घर के साथ साथ रोशनी किसी ज़रूरत मंद के घर लगाई हो ..........................
दीपावली की रौनक इस तरह छाई हो
हर्ष उल्लास के साथ
हर चेहरे पर मुस्कुराहट छाई हो...........
दीपावली की बधाई हो
सोनाली निर्मित सिंघल

Friday, 13 October 2017

दीप दीपावली के हम जलाएँ

दीप दीपावली के हम जलाएँ
वहाँ सरहदों पर जवान वतन पर कुर्बान हो जाएँ
यहाँ आँखों मे हम त्योहार की रौनक सजाएँ
वहाँ वीरों के परिवार वालों की आँखें भर आएँ ,
यहाँ भाईयों की मनपसंद , हम मिठाइयाँ बनवाएँ
वहाँ वीरों की बहने उन मिठाइयों को देख देख रोती जाएँ ,
कैसा अजब सा नज़ारा है ना......
देश में देशवासी त्योहार मनाएँ
हमारी खुशाली के लिए वीर अमर हो जाएँ ,
क्या हमारा फ़र्ज़ नही
कि हम उनके लिए कुछ कर पाएँ
मानते हैं कि उनका दुख तो हम कम नही कर सकते
तो चलो कम से कम उनका दुख ही बाट आएँ ...




Wednesday, 11 October 2017

खुद को अभी इस काबिल नही समझते

खुद को अभी इस काबिल नही समझते
कि किसी और की ग़लती सुधार सके
बस इस काबिल समझना चाहते हैं खुद को
कि कारण कोई भी हो बस 
 अपना समझ हमें कोई पुकार सके...........

Saturday, 7 October 2017

सुहागन का सजे सुहाग

सुहागन का सजे सुहाग
सिंदूर की राखे साजन लाज ,
माँ के आँचल तले
दुनिया बेटियों की पले ,
पिता आनन्दित हो
जब बेटी की पायल बजे
बहू के प्रेम से
ससुराल में फूल खिलें
क्योंकि
एक लड़की वो देन है
जिसके हाथों में दो परिवारों की मेहन्दी सजे ..........



Thursday, 5 October 2017

हम तुम्हारे बिना जी नही सकते

हम तुम्हारे बिना जी नही सकते
और तुमसे ही रूठे बैठे हैं
हमें नही दिखता कोई रास्ता
हम ऐसे क्यों रहते हैं ,
तुमसे तुम्हारी ही बात कह नही पा रहे
शायद इसलिए ही नज़रे चुरा रहे ,

लिख कर छोड़ रहे है ये सोच कर की शायद
तुम्हारी नज़र इस पर पढ़ जाए
क्योंकि
हम तो सीधा तुम्हे ये भेज भी नही पा रहे ..........

Tuesday, 3 October 2017

हसीन लगती थी मैं सबको जब तक कसिन थी

हसीन लगती थी मैं सबको जब तक कसिन थी जब से नज़ाकत छोड़ी है
लोगो के नज़रिए ने नज़रे मोडी हैं
कुछ ना करती थी तो ठीक था
अब कुछ भी करलूँ तो
सबको लगता है थोड़ी है
ये कैसी लोगो ने दिखावे की चादर ऑडी है
बुद्यू इंसान भाता है
जिसको देख कर भी नज़र नही आता है
जिस दिन वो बोलने लगता है
वही इंसान बिकार नज़र आता है ..............